आइये दशहरा मनायें

आओ इस बार एक नये रूप में दशहरा मनायें
राम से प्रेरणा लेकर जीवन में राम ही हो जायें
रावण का पुतला तो हर साल जलाते हैं खुशी में
चलो खुश होकर अब मन के रावण को ही जलायें।

केवल अंंधकार ही नहीं अहंकार भी जले
केवल अपमान ही नहीं अज्ञान भी जले
केवल मार्ग का कष्ट ही नहीं पथभ्रष्ट भी जले
केवल दिप ही नहीं ज्ञान का प्रकाश भी जले
सारी खुशियों के मेले को इस आंगन में बसायें
आओ इस बार………………………………….

केवल विचार ही नहीं संस्कार भी मिले
केवल दाम ही नहीं पुण्य धाम भी मिले
केवल योग्यता ही नहीं सफलता भी मिले
केवल हाथ ही नहीं हर हृदय भी मिले
समझ लो बुराइयों को अपनी अच्छाइयों से हरायें
आओ इस बार………………………………….

केवल कर्म ही नहीं मानव धर्म भी खिले
केवल सुमन ही नहीं जीवन भी खिले
केवल अलंकार ही नहीं व्यवहार भी खिले
केवल श्री मुख ही नहीं अंतर मन भी खिले
अपनी जीत से विजयदशमी का पंडाल सजायें
आओ इस बार………………………………….

पूर्णतः मौलिक स्वरचित सृजन की अलख
आदित्य कुमार भारती
टेंगनमाड़ा, बिलासपुर, छ.ग.

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