आइना (लघुकथा)

आइना
दरवाजे की डोरबेल बजी तो भानु ने अपनी मम्मी से कहा-लगता है, दरवाजे पर कोई आया।

उसकी माँ ने कहा-बेटा जाकर देखो तो कौन है ?

भानु ने जाकर देखा तो गुप्ता अंकल थे।

उसने कहा-अंकल आइए-आइए, बैठिए।वे बोले, नहीं बेटा, बैठूँगा नहीं। ज़रा जल्दी में हूँ। ये बोलते हुए वे अंदर आकर ड्राइंग रूम में बैठ गए और बोले अपने मम्मी-पापा को बुला दो।

भानु बोला- अंकल पापा तो हैं नहीं,वे तो ऑफिस गए हैं। मम्मी हैं, कहिए तो बुलाऊँ।

उन्होंने ठीक है बेटा,उन्हें ही बुला दीजिए।उसने अपनी मम्मी को आवाज़ देते हुए कहा- मम्मी, गुप्ता अंकल आए हैं,आपको बुला रहे हैं।

राधिका जब ड्राइंग रूम में पहुँची तो उन्होंने अपनी बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र दिया और बोले मैडम आप सपरिवार सादर आमंत्रित हैं। थोड़ा समय निकालकर आप लोग वर-वधू को आशीर्वाद देने अवश्य आइएगा।

राधिका ने कहा-अवश्य भाई साहब। हम सब जरूर आएँगे।

जब गुप्ता जी चले गये, तो तुरंत भानु ने अपनी माँ से पूछा माँ कब शादी है?मैं भी आपके साथ चलूँगा पार्टी में।

राधिका ने निमंत्रण पत्र देखकर बताया,बेटा परसों 22 नवंबर को शादी है। तुम भी चलना,मैं तुम्हें ले चलूँगी।

22 नवंबर को जब राधिका और उसके पति पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगे तो उन्होंने भानु से भी तैयार होने के कहा।

भानु ने कहा, मम्मी मुझे भी कपड़े दे दीजिए।राधिका ने उसे अलमीरा से कपड़े निकाल कर दिए।

भानु कपड़े पहनकर तैयार हुआ और बाल बनाने के लिए ड्रेसिंग टेबल के पास जा रहा था तभी उसने माँ की तरफ देखा, वे खड़ी -खड़ी मुस्करा रही थीं और अपने बच्चे की बलैया ले रही थीं।

माँ की तरफ देखकर भानु ने कहा- मम्मी चलिए,मैं रेडी हो गया। राधिका ने कहा- बेटा एक बार अपने आपको ड्रेसिंग टेबल में जाकर देख तो लो।

भानु बोला- मम्मी आपसे अच्छा कौन-सा आइना होगा। आपको अच्छा लग रहा हूँ, ये मैं आपके चेहरे को देखकर समझ गया हूँ। अब मुझे आइना देखने की जरूरत नहीं।

डाॅ बिपिन पाण्डेय

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साहित्य अध्येता Books: संपादित- दोहा संगम (दोहा संकलन) तुहिन कण (दोहा संकलन) समकालीन कुंडलिया (... View full profile
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