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आंसू कहाँ बहाने निकले

बसंत कुमार शर्मा

बसंत कुमार शर्मा

गज़ल/गीतिका

December 21, 2016

जनता को बहकाने निकले
नेता वोट जुटाने निकले

मंचों पर जब जंग छिड़ गयी
क्या क्या तो अफसाने निकले

नेता,अफसर,चमचों के घर,
नोट भरे तहखाने निकले

कहते थे घर-बार नहीं, पर
उनके बहुत ठिकाने निकले

जब गरीब को देना था कुछ
घुने हुए के दो दाने निकले

दिखी रौशनी कहीं शमा की
जलने को परवाने निकले

फैंक रहे थे मुझ पर पत्थर
सब जाने पहचाने निकले

ढूंढ रहे थे मंदिर मस्जिद
गली गली मयखाने निकले

अच्छे थे आँखों में आँसू
हम भी कहाँ बहाने निकले

Author
बसंत कुमार शर्मा
भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन
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