आँसू

दृगों से छलकता
नीर ही परिचय नहीं
है,तुम्हारा ।
त्रासदी के क्षणों में
निकले जल-बिंदु
भी नहीं बता सकते,
तुम्हारा रूप व सौंदर्य ।
प्रसन्नता की
स्वर-लहरी में
तुम निकलते तो हो
लेकिन पूरे नहीं।
इसलिए-यदि किताब
ही कहूँ तुम्हें तो
तुम तो वह किताब हो,
जिसको पढ़कर
समझा जा सकता है,
पूरा जीवन ।
-ईश्वर दयाल गोस्वामी।

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