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आँचल संभाल कर चलना : कविता

आँचल संभाल कर चलना हवाएँ तेज़ हैं।
कमसिन उम्र की होती ये अदाएँ तेज़ हैं।।

कलियों की रुत पर,भ्रमरों की नज़ाकतें।
आने लगी हैं सुनिए,सरेआम ये शिकायतें।
नज़रें बचाकर चलना यहाँ बेवफ़ाएँ तेज़ हैं।
कमसिन उम्र की……………..

अश्क़ों के मोती ये,बह न जाएँ इश्क़ में।
लाज का पर्दा लोग उठा न पाएँ इश्क़ में।
जवानी की आग-सी फैलें अफवाहें तेज़ हैं।
कमसिन उम्र की……………..

मुश्क़िल बहुत है इश्क़ की राह में चलना।
आसान बहुत है मगर यार प्यार ये करना।
ज़ालिम इस इश्क़ की होती सज़ाएँ तेज़ हैं।
कमसिन उम्र की……………..

दर्दे-इश्क़ की दवा नहीं मिलती है कहीं भी।
बेवफ़ा को पर वफ़ा नहीं मिलती है कहीं भी।
सच्चे इश्क़ की तो होती तपस्याएँ तेज़ हैं।
कमसिन उम्र की………………

एक शेर
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इश्क़े-उफान अगर दिल में कभी उठे।
संभाले न संभले और दिल मचल उठे।
कलेजा तुम पत्थर का कर लेना”प्रीतम”
शीशे के दिल बहुत यहाँ बिखरे और टूटे।
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राधेयश्याम बंगालिया
प्रीतम….प्रीतम….प्रीतम….प्रीतम
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इश्क की होती सजाएँ तेज हैं।

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आर.एस. प्रीतम
आर.एस. प्रीतम
जमालपुर(भिवानी)
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प्रवक्ता हिंदी शिक्षा-एम.ए.हिंदी(कुरुक्षेत्रा विश्वविद्यालय),बी.लिब.(इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) यूजीसी नेट,हरियाणा STET पुस्तकें- काव्य-संग्रह--"आइना","अहसास और ज़िंदगी"एकल...