आँखों में पानी क्यों नहीं

ढूँढ रहा हूँ मैं तो जवाब इस सवाल का
वतन पर मिटती है अब जवानी क्यों नहीं/

इस धरा पर दूर तक सागर का विस्तार है
पर रही लोगों की आँखों में पानी क्यों नहीं/

अब तो दिखता घर में सब कुछ नया ही सा
रखे अब कोई बुज़ुर्गों की निशानी क्यों नहीं/

धन से धन को जोड़ने में सब तो हैं लगे हुए
अब कोई होता यहाँ कर्ण सा दानी क्यों नहीं/

सब तो हैं बस बाहरी सौंदर्य में ही उलझे हुए
अब तो ये इश्क़ भी होता है रुहानी क्यों नहीं/

फूल को छोड़कर अपने लिए बस काँटे चुने
कोई भी करता अब ऐसी बेईमानी क्यों नहीं/

गर धरा पर उगाएँ सभी प्यार का पौधा अजय
मस्त हो जाएगी सभी की ज़िंदगानी क्यों नहीं/

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