आँखों का रिस्ता

कैसा रिस्ता आंखों का,
है विदित सभी को ही यह।
जुड़ता आकाश शब्द सा,
जीवन की सरिता से यह।।

यह अंजन रेखा काली,
देती है मुझे निमंत्रण।
आ जाओ प्रियतम मेरे,
कहती है प्रतिपल प्रतिक्षण।।

इन चक्षु भवन में ही है,
सोया इक मौन संदेशा।
इस मौन निमंत्रण ने है,
दी है इक विपुल पिपासा।।

ये सागर जैसी आँखे,
गंभीर गगन गरिमा सी।
जातक की लीला करती,
ये अम्बर की महिमा सी।।

पड़ जाती दृष्टि जिधर भी,
कर देती मौन सभी को।
इक पल में ही हर लेती,
मानुष के हृदय कमल को।।

मदमाती पवन के झोकों सी,
करती हैं खंजन क्रीड़ा।
देती हैं ब्यथित हृदय को,
जीवन जीने का सहारा।।

लग जाती ग्रहण के जैसी,
जीवन के नवल चंद्र को।
सब कुछ अस्तित्व मिटाती,
देती एक किरण प्रणय को।।

श्रृंखला बना देती हैं,
जीवन मे सुख दुख की यह।
करती हैं सूने मन को,
स्पंदित एक पल में यह।।

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अमित मिश्र
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