कविता · Reading time: 1 minute

आँखें क्यों नम हुई फिर आज ?

आँखें क्यों नम हुई फिर आज ?
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ख्वाबों में सजाया था जिसे,
पलकों पे बिठाया था जिसे,
जिसके अधर नयन की जुगलबंदी में,
उम्र की फितरत का भी पता न चला।
उसी का सुंदर मुखड़ा देख,
आँखे क्यों नम हुई फिर आज ?

भूला नहीं मैं वो सुनहरे पल,
तेरी तीक्ष्ण नजरों का कहर ,
बेरुखी नजरो में भी प्यार बरसती बनकर।
नजरों के बेरुखीपन का भी ,
कोई ग़म नहीं है मुझको याद ।
आँखें क्यों नम हुई फिर आज ?

सुध- बुध होकर जुल्फों के छाँव तले,
अरमानों के समंदर में गोते लगाता,
टूटते तारों से अरमानों की फ़रियाद करता,
भूल न सकेंगे वो पल, वो रात।
दिल ने कैसे किया था कोई फरियाद ,
आँखें क्यों नम हुई फिर आज ?

आज चिर निद्रा में सोया हूँ मैं जो,
देख रहा अधखुली पलकों से ,
गगन से, झील के इस पार ।
धरा पर इतनी चहल-पहल भरी,
उदासी क्यों है आज ।
अधखुली आँखें भी क्यों नम हुई फिर आज ?

एक अंतिम चाहत थी जिन्दगी की,
जिंदगी के बिछुड़ने से पहले,
मन बैरागी हो जाता,
जी लेने की भी,कोई खुशी न होती,
मौत का भी कोई ग़म नहीं होता ।
काश ! ये ऐसा होता,जो पूरी न हो सकीं आज।

आँखें क्यों नम हुई फिर आज ?

मौलिक एवं स्वरचित

© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि – ३० /०७/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

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