आँखें।।

वो इजहारे इश्क़ यूँ, निगाहों निगाहों से कर गए,
महफ़िल में जो कहते थे कि, बेजबान है आँखें।।

खुन्नस लिए जो बैठे थे, न कभी कहते जुबां से,
जाहिर हुवा घूरने से, इतनी बदजबान है आँखें।।

नजरें मिलाने से तो वो, हैं कुछ कतराते इस कदर,
की पल दो पल को घर आये हुवे, मेहमान है आँखें।।

हुवें तस्वीर भी धुंधली, हुवा है अक्स भी ओझल।
अभी फिलहाल सरहदों की, निगेहबान है आँखें।।

कोई कितना अपना है, कोई कितना पराया है।
“चिद्रूप” बेमरव्वत इस जहाँ से, अनजान है आँखें।।

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०९/०२/२०१९ )

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