अ मेरी कलम

जानता हूँ तुझसा श्रेष्ठ,
मेरे लिए कोई नहीं।
अ ‘कलम’ तेरे प्रति,
प्रीत मेरी कभी सोई नहीं॥

पर तेरी श्रेष्ठता पर प्रश्न चिह्न,
क्या मैं लगा नहीं रहा।
तेरी प्रतिष्ठा को मैं तुच्छ,
कलंक क्या मैं लगा नहीं रहा॥

कौन सा प्रण मैं तेरे लिए,
अ कलम निभा रहा।
हर वक्त रोजी-रोटी का,
दंश है मुझे खा रहा॥

जानता हूँ संग तेरे भी,
जीवन बिता सकता हूँ।
पर इस परिवार से,
क्या मोह छुड़ा सकता हूँ?

शूल बनके चुभ रहे हैं,
शर से ये शब्द मुझे।
मेरे हिय को देकर घाव,
कर रहे हैं दग्ध मुझे॥

बोल कुछ मेरी कलम,
कैसे मैं तेरा मान करूँ!
कौन सा दायित्व निभाऊँ,
और कौन सा हत्प्राण करूँ!

तेरे बिछोह को भी कभी,
मैं नहीं झेल पाऊँगा।
पर दायित्व जो प्रति परिवार के,
उससे विमुख कैसे हो पाऊँगा?

कोई तो राह सुझा कलम,
जो मन की ये व्यथा मिटे।
जला मन में चिनगी ऐसी,
जो अंधकार का पर्दा हटे॥
*सोनू हंस*

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