कविता · Reading time: 1 minute

अहम्

मुँह अंधेरे सवेरे किसी ने मुझे झिंझोड़कर जगाया ,
उठकर देखा तो सामने एक साए को खड़ा पाया ,
मैंने पूछा कौन हो तुम ? तुमने मुझे क्यों जगाया ?
उसने कहा मैं तुम्हारा अहम् हूं ,
तुम्हारी कल्पना की नींद से मैंने ही तुम्हें जगाया ,
मेरी खातिर तुमने अपने अच्छे रिश्तोंं को गवांया ,
अपने अच्छे दोस्तों के नेक सुझावों को ठुकराया ,
बड़े बूढ़ों की नसीहतों को नज़रअंदाज़ किया ,
संस्कार और मूल्यों तक को दांव पर लगा दिया,
हमेशा खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए कुतर्क का सहारा लिया ,
दूसरों की प्रज्ञा को तिरस्कृत कर अपमानित किया ,
यथार्थ के धरातल पर न रहकर तुम काल्पनिक उड़ान भरते रहे,
सच और झूठ , छद्म और यथार्थ , के अंतर को कभी समझ न सके ,
तुम मतिभ्रम होकर ,अपने ही द्वारा निर्मित तिमिर में भटकते रहे,
कभी स्वयं का जागृत संकल्प पथ प्रशस्त न कर सके ,
तुम्हें संज्ञान नहीं कि जिस पथ पर तुम हो ,
वह तुम्हें अधोगति मे ले जाएगा ,
दिग्भ्रमित उस पथ पर द्वेष , क्लेष एवं संताप के सिवा कुछ भी हासिल न होगा ,
तुम्हारी अंतरात्मा की आवाज का मान रखकर ,
मैं तुमसे अलग हो रहा हूँ ,
तुम्हारी उन्नति के पथ पर बाधा न बनूँ ,
इसलिए तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ ,

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