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'अहंकार'

अभी रुक्मिणी आँफिस पहुँची ही थी कि चपरासी ने आकर बोला मैडम बुला रही हैं। रुक्मिणी अपना बैग रख कर फौरन अपनी बास के पास पहुँची। मैडम सुरभि अपने कमरे में अपने पुराने अंदाज में यों बैठी थी मानों जग जीत कर आयी हों।रुक्मिणी ने प्रातः अभिनंदन के साथ कमरे में प्रवेश किया। सुरभि मैडम ने मुस्कुराहट के साथ अभिनंदन स्वीकार किया। किन्तु ये मुस्कुराहट सहज नहीं बल्कि कुटिल थी। फिर कहा, “क्या रुक्मिणी तुम से एक काम भी सही नहीं होता। ये फाइल देखो। इसे फिर से तैयार करो।” “लेकिन मैम आपने जैसा कहा था मैनें बिल्कुल वैसे ही इसे तैयार किया है।”रुक्मिणी ने कहा। सुरभि मैम के तेवर चढ़ गये और कहा, “नहीं तुम्हे इसको फिर से बनाना पड़ेगा, ले जाओ ये फाइल।” दुःखी मन से रुक्मिणी फाइल लेकर अपने कमरे में आ गयी। अतिरिक्त 3 घण्टे वह मेहनत कर के उस फाइल को तैयार की थी। इस काम की वजह से वह अपने 2 वर्ष के बच्चे को छोड़कर आफिस में रात 8 बजे तक रुकी रही। ” क्या हुआ रुक्मिणी?” सहकर्मी विमला ने पूछा तो रुक्मिणी रूआँसी हो गयी और बोली, “कुछ नहीं मेरी किस्मत है।” विमला ने कहा, “किस्मत को दोष क्यों देती हो, सुरभि मैम का स्वभाव ही खराब है। और यहाँ येबात किसे नहीं पता। वो इतनी अहंकारी है कि उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वो क्या कह रही है और क्या कर रही हैं।जब तक दूसरों को परेशान नहीं कर लेती तब तक उनका खाना नहीं पचता। और फिर उनके चमचे उन्हें और अहंकारी बनाने में उनकी मदद करते हैं।” “परेशानी तो यही है विमला दीदी कि सभी को अपनी पड़ी है। जानें क्या मिलने वाला है। मैं तो दुःखी हो गयी हूँ छोड़ दूँगी नौकरी।” उदास मन से रुक्मिणी ने कहा। “बिल्कुल नहीं, तुम नौकरी नहीं छोड़ोगी। मैं तुम्हारे साथ हूँ बोलो क्या करना है फाइल में?” विमला ने बड़े आत्मविश्वास से कहा। ” पता नहीं दीदी बस कहा है फिर से बनाओ।” रुक्मिणी ने अनमने भाव से कहा। “हाँ तो ठीक है जब पता नहीं तो इन्हीं पेजों को नयी फाइल में लगा कर थोड़ी देर मेंं चपरासी से भिजवा दो।” विमला ने कहा। रुक्मिणी चिन्ता में पड़ गयी कहा “पर दीदी ये तो गलत है वही फाइल? “क्यो? गलत क्यों है? जब पता ही नहीं, दुबारा भी वही भेजो। वैसे भी उसका मुँह सड़ा है सड़ा ही रहेगा।” विमला ने समझाया। “लेकिन….।” रुक्मिणी घबरायी। “अरे कुछ घबराने की जरूरत नहीं। मैं जैसा कहती हूँ वैसा करो।” विमला ने समझाया। रुक्मिणी ने वैसा ही किया और सोच लिया जो होगा देखा जायेगा। फाइल लेकर चपरासी सुरभि मैडम के पास गया और फाइल दे दी।सुरभि ने रुक्मिणी को बुलवाया। डरते-डरते रुक्मिणी सुरभि मैम के कमरे में गयी। “तुमने इसमें सुधार कर दिया रुक्मिणी?” सुरभि ने पूछा। “जी मैम” डरते-डरते रुक्मिणी ने जवाब दिया। “यही एक बार में करती तो कितना अच्छा होता। ठीक है तुम जाओ।” सुरभि ने कहा।रुक्मिणी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह मन ही मन मुस्कुराते हुये वापस आ गयी। उसने विमला दीदी की तरफ देखा और मुस्कुराने लगी। विमला दीदी ने उसे प्यार भरी नज़रों से देखा और थम्स अप किया।

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डा0 निधि श्रीवास्तव
डा0 निधि श्रीवास्तव "सरोद"
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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"