अहंकार

लज़्ज़ता छोड़ निर्लज़्ज़ता ओढ़ी ।
शर्म हया भी रही नही जरा थोड़ी ।
रहे नही शिष्ट आचरण अब कुछ ,
अहंकार की चुनर एक ऐसी ओढ़ी ।
….. विवेक दुबे”निश्चल”@…

Like Comment 0
Views 4

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing