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“असमंजस “(समसामयिक कविता)

ramprasad lilhare

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कविता

March 13, 2017

“असमंजस “(समसामयिक कविता)

उत्क्षिप्त,कुण्ठित सी हालत मेरी
कैसें करूँ वकालत तेरी
तुच्छ,अंतिम पंक्ति का मैं सेवक
कैसें बनूँ मैं तेरा खेवट
मन में मेरे हैं असमंजस
कैसें करूँ मैं सामन्जस।

सच कहूँ तो तु बचता हैं
झूठ कहूँ तो मैं
स्थिति एेसी विषम बनी हैं
एक का मरना तय
मन विचलित मैं क्या करूँ
खुद बचकर तुझे मारूँ
या,तुझे बचाकर मैं मरूँ
मन में मेरे हैं असमंजस
कैसे करूँ मैं सामन्जस।

स्वार्थ स्वार्थ उचित हैं मेरा
पर,भरा पूरा परिवार हैं तेरा
स्वार्थ मैं अपना छोड़ न सकता
तुझे भी बेबस छोड़ न सकता स्वार्थ छोडू बहिर्मन कोसे
तुझे छोडू अन्तर्मन कोसे
मन में मेरे हैं असमंजस
कैसें करूँ मैं सामन्जस।
रामप्रसाद लिल्हारे
“मीना “

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Author
ramprasad lilhare
रामप्रसाद लिल्हारे "मीना "चिखला तहसील किरनापुर जिला बालाघाट म.प्र। हास्य व्यंग्य कवि पसंदीदा छंद -दोहा, कुण्डलियाँ सभी प्रकार की कविता, शेर, हास्य व्यंग्य लिखना पसंद वर्तमान में शास उच्च माध्यमिक विद्यालय माटे किरनापुर में शिक्षक के पद पर कार्यरत। शिक्षा... Read more