गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

‘अविश्वास’

शक करना वो भी बेवजह ।पति-पत्नी, समाज में एक दूसरे से ;हर जगह शक का घेरा है।चार अशआ’र कुछ कह रहे हैं:-
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‘अविश्वास’
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क्यों शक है हर शख़्स पर !
अविश्वास का घाव जरा गहरा है?

करूं अब किससे शिकायत !
व्यवस्था का हर कान बहरा है ?

मुंह से निकाल अल्फ़ाज़ सँभल कर !
अब तो हर लफ़्ज़ पर पहरा है ?

अब नहीं देखता हर रोज़ आईना !
पहचानूँ कैसे मुख मेरा है कि तेरा है?
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राजेश’ललित’शर्मा

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