कविता · Reading time: 1 minute

अवध

ना रही है सुबह-ए-बनारस
ना ही रही है शाम-ए-अवध
ना ही नवाबों की नफ़ासत
ना ही तहज़ीब और
ना ही नज़ाकत…
रौनक-ए-अवध चली गई
ईमान-ए-अवध चला गया
वो शोख़ियां चली गई
वो लफ़्ज़ों की मिठास चली गई
ऐ दिलवर- सुकून-ए-दिल,  
ठुमरी,ग़ज़ल,मुजरा सब चला गया
वो शान-ए-अवध “नवाब” कहाँ चला गया
वो शान-ए-अवध “नवाब” कहाँ चला गया

सुनील पुष्करणा

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