अवधी रचना- सावन माँ मन भावन है.

सावन माँ मन भावन है, शिव डमरू से फूट रही रसधारा,
खेतन, बागन, मेडन मा, हरियाली लपेटे तयार है चारा,
गोरु बछेरू पशू औ परानी के साथे जवान सेवान है सारा,
धरती की छाती मा रोपै बदे करजोरि बोलावत धान बेचारा.

दामिनि दमकै नभ से भुई तक ओरौनी बहे जस मोट पनारा,
काली घटा घनघोर घिरी दिन ही मा देखाय परा है सितारा,
देह बुढान सयान भई, नस – नस मा बहे सिंगार की धारा,
दुइनौ परानी कै आँख लड़ी, फिर बंद भवा पूरी रात केवारा.

खटिया छोटवार अटारी लिहे,है ओनात किसान कै धीरज प्यारा,
अपनी चनरमा कै सोभा लखी, सुहुराई रजत पायजेब तुम्हारा,
बिजुरी बिन जब अंधियार परे,पट खोल करो मुख से उजियारा,
आज धना अस खेल करो, कि उठाये से हम ना उठी भिनसारा.

सेज पे रोज ही सोवत हौ, तन औ मन आज बिछाए है दारा,
कंता बिना सुस्ताये चलो, जब तक नभ मा चमके ध्रुव तारा,
मेल – मिलाप की बारिश मा, धरती ठंड्हाय बुझे अंगारा,
प्रेम – पयोधि के सागर मा, बूड़े उतराय जहान ई सारा.

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