Apr 24, 2020 · कविता

*** " अलविदा कह गया कोई........!!! " ***

*** अज़नबी हूँ शायद ,
अनाड़ी बना गया कोई ।
मीठे-मीठे बातें बोल ,
फ़रेब का गुल खिला गया कोई ।

चमन की अनुपम लीली ,
नरमी-नरमी , मखमली ;
हाथों से हाथ मिला ,
मन-वीणा की तार ,
न जाने कितने बार ;
हिला गया कोई ।
अवंतिका गुरुग्राम की ,
मन-प्रित अभिराम की ;
होले-होले चाहत का ,
सरगम सुर मिला गया कोई ।
पल झपकती , एक ही इशारों में ;
मलया-शीतल-सी समीर ,
मंद-मंद मन-मंदिर में ,
बहा गया कोई ।
पल भर के लिए ,
बुलर-डलझील का ऐहसास ;
दिला गया कोई ।

*** मन-चंचल , तन-उज्ज्वल ,
और निगाहों से ज़ाम पिला ;
बिन मौसम बहारें ला गया कोई ।
और भी कैसे न कहूँ ,
ज़मीं पर स्वर्ग की झलक दिखा गया कोई ।
मुसाफ़िर हूँ शायद अनाड़ी ,
मधुशाला की राह दिखा गया कोई ।
मित्र कहे क्या हुआ…?
अरे…! ओ हर-हर भोले ….!!
पर..न जाने क्यों..?
मेरा बैरागी मन कुछ बोले।
क्या करे…! , ये मुसाफ़िर-चितचोर ,
सागर मंथन में अविराम है ।
नयनों में है अविरल अंस्रूधारा ,
विचारों में अल्पविराम है
चाहत का इकरार लिये ,
छलकती अश़्कों ने पूछा ;
” कब मिलेंगे….? “
” ऱब जाने , हम क्या जाने ….? ” ;
आवाज़ देकर चला गया कोई ।

*** अज़नबी हूँ शायद ,
अनाड़ी बना गया कोई ।
मीठे-मीठे बातें बोल ,
फ़रेब का ग़ुल खिला गया कोई ।
कहता है ये मन आवारा ,
” अब अलविदा कह गया है कोई । “
” अब अलविदा कह गया है कोई । “

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* बी पी पटेल *
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
२२ / ०४ / २०२०

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