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अरमानो के मेले में जब ख्बाबों के महल टूटे

मदन मोहन सक्सेना

मदन मोहन सक्सेना

कविता

August 8, 2016

सजा क्या खूब मिलती है किसी से दिल लगाने की
तन्हाई की महफ़िल में आदत हो गयी गाने की

हर पल याद रहती है निगाहों में बसी सूरत
तमन्ना अपनी रहती है खुद को भूल जाने की

उम्मीदों का काजल जब से आँखों में लगाया है
कोशिश पूरी होती है पत्थर से प्यार पाने की

अरमानो के मेले में जब ख्बाबों के महल टूटे
बारी तब फिर आती है अपनों को आजमाने की

मर्जे इश्क में अक्सर हुआ करता है ऐसा भी
जीने पर हुआ करती है ख्वाहिश मौत पाने की

मदन मोहन सक्सेना

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Author
मदन मोहन सक्सेना
मदन मोहन सक्सेना पिता का नाम: श्री अम्बिका प्रसाद सक्सेना संपादन :1. भारतीय सांस्कृतिक समाज पत्रिका २. परमाणु पुष्प , प्रकाशित पुस्तक:१. शब्द सम्बाद (साझा काब्य संकलन)२. कबिता अनबरत 3. मेरी प्रचलित गज़लें 4. मेरी इक्याबन गजलें मेरा फेसबुक पेज... Read more
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