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–” अम्मां “–
अम्मां नून तेल की खुशबू अम्मां समीर पूरवाई है
अम्मां तू चौखठ दरवाजे अम्मां तू अंगनाई है.

पैदा हुए हम नंगे बच्चे कपड़ा तूने सिलाया था
इन नन्हें नन्हें पांवों को उंगुली पकड़ चलाया था
लगी कहीं पे चोट कभी तो अम्मां तू मीठी दवाई है.

फिर हम थोड़े बड़े हुए तो चलना फिरना सीखा था
पेंसिल पकड़ तेरे हाथ से अम्मां – अम्मां लिखा था
मास्टरजी के डंडे की चोटें अम्मां तू हल्दी चूना सिंकाई है.

बनते होंगे महल अटारी मैंने कुछ न बनाया है
पाते होंगे हाथी घोड़े पर मैंने कुछ न पाया है
अज्ञानी से इस बालक की अम्मां तू ही कमाई है.

सारी दुनिया घूम के आया पर तेरे जैसा एक न पाया
जहर बुझे हैं शब्द सभी के शहद सरीखा तेरा साया
अम्मां है तू गुड़ गन्ने सी अम्मां तू जलेबी मिठाई है.

सोचा नहीं कभी भी मैंने क्या काटा क्या बोया मैंने
हिसाब नहीं किया कभी भी क्या पाया क्या खोया मैंने
पर इक घाटे का दुख बहुत है जिसकी केवल तू ही भरपाई है.

आए ऐसे मौके बहुत ही हमको तेरी कमी खली है
अंतस के कोनों को छूकर जब जब काली घटा चली है
अंधियारे को हरने वाली अम्मां तू दिया सलाई है.
✍️–” विशाल नारायण “

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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