कविता · Reading time: 1 minute

अम्बर की अर्धांगनी बनूँ

अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन ।
चूम चूम सीना उसका
उङती फिरूँ पूरे गगन।
अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन।

बादलों को आँचल बना लूँ
चन्द्र को माथे से लगा लूँ।
भर कर मांग सितारों से
कर जाऊँ उससे लगन।
अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन।

क्षितिज दूरियाँ लाँध फर्लांग में
तोङ विधि बंधन बन्ध जाऊँ
लगा कण्ठ से नभ को मैं
कर जाऊँ अद्भुत मिलन
अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन।

नीलिमा से वस्त्र सजाऊँ
इंद्रधनुष को हार बनाऊँ
भुजा फैला संपूर्ण स्वतंत्र
बँध जाऊँ उसके आलिंगन
अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन।

चूम चूम सीना उसका
ऊङती फिरूँ पूरे गगन
अम्बर की अर्धांगनी बनूँ
ख्वाब आज मेरे मन।

देवेन्द्र दहिया- अम्बर
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