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अमृत की बूंद :मैं रसभरी कविता!

मेरा गला घोंटकर
गणिका की तरह
बाज़ार में बेचने चले हो- – –
मैं रस भरी कविता हूँ- – –
मुझे तुकबंदी की परिधि में निचोड़कर !नीरस न बनाओ।
घनानंद की सुंदर नायिका हूँ।
ईसुरी की प्रेमिका,विरह की पीडा़ हूँ।
खूब लडी़ मर्दानी ,झाँसी की रानी की वीरता हूँ।
निराला की निर्मल काव्यधारा।
नाच रहा मेरे संग फकीरा अलमस्त कबीरा।
कृष्ण-कृष्ण का नाम भजते सुधबुध हार गई मैं मीरा।
मेरी न कोई जाति न धर्म है,न हिन्दू- मुस्लिम सिक्ख-ईसाई।
बिस्मिल के प्राणों से बह गई,टैगोर की पावन गीतांजली
भारत माँ की आजादी हूँ ।
सन् संत्तावन का जोश बन वंन्दे मातरम् कह बिगुल बजाया।
श्रृंगार करूं मैं दुल्हन सा,रणभूमि में वीरान्गना।
झूम रही मैं नन्ही बिटिया सी, झूला झूलूं आँगना।
वर्षा का रिमझिम संगीत , केवट का मल्हार गीत।
उन्मुक्त गगन में ज्यों उडे़ पखेरू
मैं पागल हवा,क्या हारुँ मैं किससे मेरी जीत।
मीर की ग़जल जीवंत हूँ मैं।
निर्जीव शब्दों से क्यों दफ़नाने चले हो?
चंद सिक्कों के लिए मेरी बोली न लगाओ।
मेरा आलिंगन करो,तुम बहुत दूर निकल गये!
फिर आओ लौटकर।

मुकेश कुमार बडगैयाँ

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