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अमूल्य बाबू

अमूल्य बाबू अपने आप में एक शिक्षा संस्थान थे। गांव से निकले अधिकांश होनहार छात्र उनके मार्गदर्शन और ट्यूशन क्लास से होकर ही किसी न किसी वक़्त में गुज़रे ही हैं।

उनकी पढ़ाने की लगन और छात्रों के पीछे उनकी मेहनत मैंने आज तक किसी शिक्षक में नहीं देखी।

छात्रों का चयन देख कर करते थे। पढ़ाई से जी चुराने वाले छात्र उनकी क्लास में ज्यादा दिन नहीं टिक पाते थे।

साल के ३६५ दिन सुबह ६ बजे से साढ़े नौ बजे तक चलने वाली, उनकी क्लास में ध्यान केंद्रित करके रख पाना एक चुनौती भी थी।

अंग्रेज़ी, गणित, इतिहास, अर्थशास्त्र और तर्क शास्त्र पर उनका ज्ञान अद्वितीय था

हमारे घर से उनका रिश्ता मेरे उनकी ट्यूशन क्लास में जाने से लगभग २५-२६ वर्ष पहले से था।

अपने दो बड़े भाइयों की पढ़ाई की प्रतिद्वंदी भावना ने जब एक ही ट्यूशन क्लास में पढ़ने से इनकार कर दिया,

तो एक बड़े भाई अमूल्य बाबू से पढ़ने चले गए , जो उस वक़्त स्कूल में नए नए आये थे।

ये खोज वास्कोडिगामा के कालीकट के बंदरगाह पहुंचने जैसी ही थी, उसके बाद तो घर के सारे जहाज , नावें, स्टीमर, ९ वीं क्लास में पहुंचते ही, वही पड़ाव डालने लगे ।

मैं भी घर की परंपरा का पालन करते हुए थोड़े उत्साह में बड़े भाई के साथ आठवीं में ही उनसे पढ़ाने का निवेदन करने पहुँच गया, तो उन्होंने ने कहा अगले साल आना।

खैर, ९ वीं क्लास में पहुंचते ही, उनके दर पर हाज़िर हो गया।

कई बड़े भाई बहनों की साख भी साथ थी, जो मुझसे पहले उनकी ट्यूशन क्लास से पढ़कर निकल चुके थे।

इसी आधार पर उन्होंने सोच लिया था इस नए कच्चे पदार्थ का प्रसंस्करण करने में भी उन्हें कोई ज्यादा परेशानी नहीं होगी,

ये फैसला उन्होंने घर से आये पिछले सामानों की गुणवत्ता को देखकर किया होगा।

घरवालों को मेरा कच्चा चिट्ठा मालूम था कि ये खेलकूद के पीछे पागल है, इसलिए एक बड़ा भाई जिज्ञासावश एक महीने बाद ही प्रगति का समाचार लेने पहुंच गया।

सर, अपनी मिश्रित भाषा में बोल उठे, ” ओंको ठीक करता है बाकी थोड़ा फांकी बाज़ है” (गणित ठीक कर लेता है पर थोड़ा फांकी बाज़ भी है)

उनकी ट्यूशन की राशि हमारे घर के लिए १५ रुपये प्रतिमाह और बाकियों के लिये २५ रुपये थी।

एक बार ४-५ महीने की बकाया राशि देने गया तो काकी माँ ने देखा और मज़ाक में पूछा, ये १५ रुपये क्यों देता है, सर ने कहा ये १५ ही देगा।

उस वक़्त की घर की माली हालत उनसे छुपी हुई नहीं थी।

उन्होंने ट्यूशन के पैसे खुद चलाकर कभी नहीं मांगे। छात्र ने दिया तो ठीक नहीं दिया तो ठीक।

उनको तो सिर्फ पढ़ाने का शौक था।

सुबह ६ बजे से शुरू होने वाली उनकी ये लंबी कक्षाएं , चार पांच कप चाय पीकर और चारमीनार सिगरेट के टुकड़े कप में ही डाल कर, जब उनको लग जाता कि और चाय नहीं मिलने वाली क्योंकि खुद को भी नहा धोकर स्कूल में पढ़ाने जाना है।

तब वो कहते कि जाओ कल आना!!

ये शब्द सुनकर ऐसा लगता कि जैसे कोई तंद्रा सी टूटी है और ये लगता कि कितने युगों से पढ़ते आ रहे है।
और साथ में ये आभास भी होता कि उँगलियाँ पेन पकड़ कर लिखते लिखते दुख भी रही है।

रविवार , जो छुट्टी का दिन होता था, उस दिन क्लास सिर्फ एक डेढ़ घंटे और बढ़ जाती थी। एक दिन जब सब छात्र जाने लगे , तो उन्होंने रोक लिया और कहा, तुम आज बाजार से सब्जी ला दो, रुको तुम्हारी काकी माँ से पूछ कर आता हूँ। तुम तब तक ये कुछ सवाल हल कर लो।
मैंने मन ही मन जवाब दिया, पिछले साढ़े चार घंटे से आपकी दया से यही कर रहा हूँ!!

वो फिर 15 मिनट बाद ही आये, उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि इतना समय तो इसको लग ही जायेगा।

फिर जब वो थैला और पैसे देने घर के बरामदे में आये, तो देखा बाकी सब तो हल हो गए थे, एक प्रश्न आधा हल किया बचा हुआ था,

तब वे दया की मूर्ति बनकर बोले, ये घर जाकर कर लेना।

मैं अपने ऊपर की हुई उनकी इस असीम कृपा को नमन करके उठ खड़ा हुआ ,

थैला और पैसे लेकर उनके घर से निकल कर सड़क को स्पर्श करने वाला ही था,

कि उनका स्वर पीछे से सुनाई दिया, एक मिनट रुको। मैं फिर आशंकित हो उठा, वो घर के अंदर गए, कुछ और पैसे लेकर आये और धीरे से मुस्कुराते हुए बोले,

“दो पैकेट चारमीनार और तुम्हारा आंटी के लिए पोचा का पान दोकान से दो ओखैरा मिस्टी पान(बिना कत्थे का मीठा पान) भी ले आना।

ट्यूशन क्लास के दौरान कभी कभी हौसला आफजाई भी इस तरह से हुई कि,

“शोरमा, इस मोंगोलबार का हाट में जाकर एकठो छागोल खोरीद के लाएगा ओर उसको ट्यूशन देगा, देखना वो भी फार्स्ट डिवीज़न से पास करेगा पर तुमलोग नहीं करेगा।”

“शर्मा, इस मंगलवार की हाट से एक बकरी खरीद कर लाऊँगा और उसको ट्यूशन दूंगा ,वो भी फर्स्ट डिवीज़न लेकर आएगी, लेकिन तुम लोग नहीं कर सकोगे”

एक क्षण उनकी ये बात सुनकर , अपनी कल्पना में एक बकरी,(हमारी संभावित नई सहपाठिनी/सहपाठी) का चेहरा भी उभर आता,

एक दो छात्रों ने मज़ाक में एक दूसरे से पूछ भी लिया,

“छागोल टा सोत्ति चोले एले बोसबे कोथाये?(यदि सच में बकरी ले आये तो उसे कहाँ बैठाएंगे)

दूसरा दार्शनिक की तरह जवाब दे बैठा,

“छागोल तो मेये देर पाशे बोशबे, फार्स्ट डिवीज़न भोद्रो रा ई पाय

(बकरी तो लड़कियों के पास ही बैठेगी, फर्स्ट डिवीज़न के लिए भद्र होना भी जरूरी है!!)

तभी एक और बोल उठा, उसकी परीक्षा का फॉर्म , फूल चंद हाई स्कूल से भरा जाएगा कि लाली मोती गर्ल्स हाई स्कूल से?

वो अपनी स्कूल को इन सब झमेले से दूर रखने के लिए ये प्रश्न उठा बैठा!!!

मैंने भी प्रश्नकाल में अपने विचार सदन में पेश कर ही दिये-

भाई बकरी से ही उसकी मंशा पूछ लेंगे,आखिर वो भी तो ८ जमात पढ़ चुकी है, सर तो नौवीं और दसवीं के छात्रों को ही पढ़ाते है ना।

सर, के किसी काम से बरामदे से उठ कर अंदर जाते ही, खुसुर पुसुर और धीमे स्वरों में ये हंसी मजाक शुरू हो जाता। सर, को भनक लगते ही, वो घर के अंदर से ही बोल पड़ते,

“शोरमा, बाड़ा बाड़ी”
(शर्मा, ये ज्यादा हो रहा है, अब)

उनको बिना देखे, ये तो पक्का यकीन रहता था कि शोरगुल करने वालो में मैं तो जरूर शामिल हूँ!!!

एक बार सर ने, बसंत नाम के एक स्कूल कर्मचारी को अपने घर के आस पास छिड़काव के लिए, स्वास्थ्य और जनकल्याण विभाग से, DDT(कीटनाशक) लाने को कह दिया, भोला भाला बसंत, वहाँ जाकर बोला , सर ने DDT मंगाई है,

अधिकारी ने पूछा, कितनी दूँ? बसंत को DDT के बारे में कुछ पता नहीं था, वो बोला 5kg दे दीजिए।

अधिकारी चौंका, इतनी सारी DDT का सर क्या करेंगे?

बसंत ने उतने ही भोलेपन से जवाब भी दिया-

“बोध होय , खाबेन”(लगता है, खाएंगे)

सर, ने ये बात हमको बतायी और हमारे साथ खुद भी जोर जोर से हँसने लगे।

इन दो सालों के दौरान , कोर्स की किताबों के अलावा , रेन एंड मार्टिन और नेसफील्ड की ग्रामर पढ़ाने के बाद, उन्होंने सिर्फ विगत ११वर्षों के ABTA के टेस्ट पेपर्स(उस समय तक बस इतने ही ,सारे ब्रह्मांड मे शायद उपलब्ध थे) ही हल करवाये थे।

साथ ही, एक अतिरिक्त पेपर तर्कशास्त्र का भी जोड़ा था,

ये उनका प्रिय विषय था, जो बेबस कतिपय छात्रों के नसीब में ही था।

एक बार शाम को क्रिकेट खेलते जाते वक्त उन्होंने देख लिया और पूछ बैठे, शाम को अगर फ्री रहते हो तो पढ़ने चले आना।

तदोपरांत, मैंने वो सड़क ही इस्तेमाल करनी छोड़ दी, मैदान का रास्ता , खेतो की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों पर चल कर ही तय हुआ।

ये वाकया, ठीक ११ वर्ष पहले मेरे एक बड़े भाई के साथ हो चुका था, वो तो छुट्टी वाले दिन फिर पूरे समय उनके घर पर ही रहते थे और इसका परिणाम प्रदेश में 32वां स्थान प्राप्त करके मिला भी था।

जब माध्यमिक का परीक्षाफल निकला तो मैं भी किसी तरह से फर्स्ट डिवीज़न ले ही आया ,

सर, खुश तो हुए ,साथ ये भी कहा कि तुम थोड़ी और मेहनत करते, फांकी कम मारते तो रिजल्ट इससे भी अच्छा होता।

उनसे कॉलेज जाकर भी छुटकारा नहीं था, अब उनसे ट्यूशन नहीं पढ़ता था,

एक बार घर के पास से गुजरते वक़्त उन्होंने बुलाया और अर्थशास्त्र के विषय में पूछा कि

“Interest is reward for parting with liquidity” की थ्योरी पढ़ी क्या?

मैंने कहा नहीं सर, अभी तो शुरुआत के एक दो चैप्टर ही हुए हैं,

वो घर के अंदर गए, एक अंग्रेजी की अर्थशास्त्र की पुस्तक लेकर आये और बोले , इस पुस्तक से पढ़ना।

वो अक्सर कहा करते थे –

“Genius is one percent intelligence and ninety nine percent perspiration”

(विलक्षण प्रतिभा के पीछे बुद्धि से ज्यादा मेहनत का हाथ होता है)

मेरी बेटी, जब कभी मुझे गुस्से में देखती है , माहौल को हल्का बनाने के लिए बोल देती है।(उसको ये सारे किस्से मालूम हैं)

“पापा, बाड़ा बाड़ी, होछे”
(पापा,अब ये ज्यादा हो रहा है)

और मैं फिर मुस्कुरा देता हूँ।

आज के दौर मे उनके जैसा शिक्षक मिलना दुर्लभ है।

मैं और मेरे जैसे छात्रों की एक लंबी कतार उनकी सदा आभारी रहेगी।

कोई भी छात्र जब भी अपने अतीत में लौटेगा, तो उसको अपने एक ” अमूल्य बाबू ” जरूर नज़र आएंगे!!!

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Umesh Kumar Sharma
Umesh Kumar Sharma
कोलकाता
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पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। अपने इर्द गिर्द जो कुछ देखता या महसूस करता हूँ...
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