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अमर कलम …

sushil sarna

sushil sarna

कविता

June 14, 2017

अमर कलम …

चलो आओ
अब सो जाएँ
अश्रु के सीमित कणों में
खो जाएँ
घन सी
वेदना के तिमिर को
कोई आस किरण
न भेद पाएगी
पाषाणों से संवेदहीन सृष्टि
भला कैसे जी पाएगी
अनादि काल से
तुमने अपना
सर्वस्व लुटाया है
तुम मूक हो
पर वो बोलती हो
जो मानवीय पथ का
श्रेष्ठ निर्धारण करे
तुम तो भाव की
अनुगामिनी हो
तुम संज्ञाहीन होते हुए भी
असीमित व्योम का
प्रतिनिधित्व करती हो
उँगलियों में कसमसाती
अंतर्मन की वेदनाओं को
चित्रित करती हो
मैं
भाव हूँ
परिस्थिति के अनुरूप
ढलने का प्रयास करता हूँ
स्वार्थ के आगे
बदल भी सकता हूँ
मगर
तुम
निष्पक्ष हो
मेरी अनुगामी होते हुए भी
सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति
नारी समान
सहनशीलता की मूरत हो
तुम बस
देती हो
मानव जाति के हित में
अपना उत्कृष्ट सृजन
तुम
आदि काल से
न थकी हो , न थकोगी
कोरे कागज़ पर
अनादिकाल तक
शब्दों की गठरी में
भावों की गांठें लगाए
काली स्याही से
उजालों की गाथा
रचती रहोगी
क्योंकि
तुम
सृजन हेतु
सृजनकर्ता की
श्वासों में बसी
अमर कलम हो

सुशील सरना

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Author
sushil sarna
I,sushil sarna, resident of Jaipur , I am very simple,emotional,transparent and of-course poetry loving person. Passion of poetry., Hamsafar, Paavni,Akshron ke ot se, Shubhastu are my/joint poetry books.Poetry is my passionrn
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