अभी तो गुलाम हैं हम

किस आज़ादी की बात करते हो तुम अभी तो गुलाम हैं हम,
जयचन्दों के कारण नहीं अपने खुद के कारण बदनाम हैं हम।

हमने इंसानियत को मार दिया, संस्कारों का चोला उतार दिया,
अपनी संस्कृति मिटाने को रचते साजिशें सुबह ओ शाम हैं हम।

सिर्फ तन से हम आज़ाद हुए हैं, सही मायनों में बर्बाद हुए हैं,
अंग्रेजों वाली नीति पर चल अपनों का करते काम तमाम हैं हम।

आँख खोल कर देखो जरा, माँ भारती का हर जख्म है हरा,
सदा सिसकती रहे माँ भारती इसका खुद करते इंतजाम हैं हम।

जनता भूखी मर रही है, सिर पर छत का इंतजार कर रही है,
गद्दारों को चुनकर नेता खुद ही देश को कर रहे नीलाम हैं हम।

अगर बचा हो थोड़ा सा ईमान, जीवित हो अंदर का इंसान,
दो जवाब क्या हम आज़ाद हैं, बस जुबान से बेलगाम हैं हम।

मुलभुत सुविधाएँ मुहैया करा ना सके, गरीबी को भगा ना सके,
अपनी कमी छिपाने को यहाँ दूसरों पर लगाते इलज़ाम हैं हम।

आज़ादी का जश्न मनाऊँ कैसे, खुद के मन को समझाऊँ कैसे,
झूठे दिलासे सुलक्षणा खुद को यहाँ देते रहते सरेआम हैं हम।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की...
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