अब मैं पुराने गांव को तरसता हूँ ...

कटा जो पेड़ मेरे आँगन से
उसकी छाँव को तरसता हूँ,

अब मैं पुराने गांव को तरसता हूँ …

एक बाहुबली पहाड़, जो गाँव का रक्षक हैं
फिर क्यों गाँव बना, उसी का भक्षक हैं;
धनलोलुप छाती रहे चीर ,
क्यों गांव हुआ निःशब्द, मूक, अधीर !

उसकी पीठ पर चल रहा हथौड़ा,
उसके घाव को तरसता हूँ
अब मैं पुराने …

अब नहीं बहती दूध – दही की नदियां
लौग ‘फैट’ मापने लगे हैं,
खुद गाय-भैंस वाले ही ,
औरों का घर ताकने लगे है !

अब ये भाव जो बढ़े हैं,
तो पिछले भाव को तरसता हूँ
अब मैं पुराने …

बजाय पढ़ाई में करने के होड़
गाँव फिल्म कर रहा डाउनलोड,
हो रहे तथाकथित अपडेट, स्कूल के फूल;
फेसबुक और व्हाट्सएप पर
रिसर्च कर रहे जी-तोड़.

जो लैम्पों में खुद को तपाते थे
उनके चाव को तरसता हूँ
अब मैं पुराने …

मंदिरों में गूँजता राम का स्वर
कही थम सा हो गया हैं,
रात का सत्संग, घडवा, खुड़ताल
कही जम सा गया हैं

जो लगता था जमघट चौपाल पर,
उस जमाव को तरसता हूँ
अब मैं पुराने …

चहकती चौपाल इतनी सुनसान क्यों हैं?
बनियों की दुकान इतनी वीरान क्यों हैं?
घरों से बाहर कोई निकलता क्यों नहीं?
जोहड़ में पानी अब झिलकता क्यों नहीं?

दादा की तीखी नसीहतें
उनके सुझाव को तरसता हूँ
अब मैं पुराने गांव को तरसता हूँ …

– नीरज चौहान की कलम से ..

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कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के...
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