कविता · Reading time: 2 minutes

——::अब मुझको वो कर दिखाना है ::—-

——:: अब मुझको वो कर दिखाना है ::—-

अपना लक्ष्य मुझे हर हाल में पाना है
लाख बाधा हो राह में नही घबराना है
ठाना है मैंने जो कर गुजरने का
अब मुझको वो हर कीमत पाना है II

माना नर्वस हु मै अपनों की नसीहत से
अब उसको ही जीवन ढाल बनाना है
है आज भी वही धार,वही तेज मुझ मैं
कर्म से साबित उनको अब कर दिखाना है II

हुआ असफल एक बार मै तो क्या
तुमने नहीं अभी मेरी ताकत को पहचाना है
सीखा है मैंने भी चींटी से संभल जाना गिर कर
जान गया हूँ अब कैसे हार के भी जीत जाना है II

कह निकम्मा सब ने मेरे जमीर को ललकारा है
नहीं रुकना, अब नही थकना, बस चलते जाना है
हूँ अभी काबिल और नजदीक भी अपनी मंजिल के
मुकम्मल खुद को बस अब कर के दिखाना है II

अब तक जो हुआ सो हुआ आगे वो अब न होगा
बन हवा का झोंका अब परचम लहराना है
नहीं हु मै वैसा जैसी कल्पना में मुझे सजाया
शायद उस से भी कही आगे अभी मुझे जाना है II

जरुरी नही मिले राहें मन माफिक सदैव
फिर भी कुछ कर मंजिल को तो पाना है I
ठहर जा ए वक्त जरा अभी लय में मुझे आने दे
क्या कर सकता हूँ मै, दुनिया को अभी ये समझाना है II

डिगा सके मुझे मेरे जीवन लक्ष्य से
जिह्वा तरकस में किसी ऐसा शब्द बाण नही है
न कर कोशिश अब लेने की मेरी धैर्य परीक्षा
इस मजबूती के सहारे मुझे उस पार जाना है !!

नहीं परवाह अब मुझे कोई कहता है तो कहने दे
बुलंदी पर खुद को अभी मुझे पहुचाना है I
चल पड़ा हूँ सज-धज कर पुरे दम-ख़म से
विजय श्री को अपने कदमो में झुकाना है II

अपना लक्ष्य मुझे हर हाल में पाना है
लाख बाधा हो राह में नही घबराना है I
ठाना है मैंने जो कर गुजरने का
अब मुझको वो कर दिखाना है II

——-::डी. के. निवातियाँ::—-

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