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अब तो निंदिया टूट गई

अरविन्द राजपूत

अरविन्द राजपूत "कल्प"

कविता

September 21, 2017

जय जयकारा करते करते साल अनेकों बीत गई ।

राजनीति के गंदे गलियारों में सदियां बीत गई।।

दिव्य स्वप्न दिखलाने वालों अब तो निंदिया टूट गई।

भड़कीले संवादों से अब आस हमारी टूट गई।।

रूठ गए अपने हमसे अमन शान्ति भी रूठ गई।

आरक्षण के भेदभाव में प्रतिभा जग से रूठ गई।।

हमें भरम में और ना डालो चाह हमारी टूट गई।

धर्म और जाति के नाम से समरसता भी फूट गई।।

धर्म की आड़ में साधू खेलें आस्था हमारी टूट गई।

प्रजातंत्र की बलिवेदी पर ‘कल्प’ भावना लूट गई।।

Author
अरविन्द राजपूत
अध्यापक B.Sc., M.A. (English), B.Ed. शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय साईंखेड़ा
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