अब तो छोड़ ओ मुसाफिर , हाय पैसे का जंजाल

अब तो छोड़ ओ मुसाफिर
हाय पैसे का जंजाल
पल भर में मिटटी हो जाये
मुद्रा ऐसी कमाल

संचित करने में जो गुजर गए
पिछले जो कई साल
जी लेता जिंदगी सुकून से
आते तो होंगे अब ये ख्याल

मोह किसी भी वस्तु का
होता अंत में दुखदायी
सम सन्तुलन से जी जिंदगी जिसने
उसी की किस्मत हुई फलदायी

मेरा मेरा करता रहा , खून अपना सोखकर
पल पल यूहीं जलता रहा , धन दूसरों का देखकर
अंतिम मंजिल एक ही सभी की , यही बात है क्यों भुलाई
हाय पैसे करते करते , क्यों आत्मा खुद ही की दुखायी ।

खर्च कर आमदन अनुसार , बात ये भी करे खुशहाल
हाय पैसे का छोड़ रे चक्कर , जी ख़ुशी से बेमिसाल
अब तो छोड़ ओ मुसाफिर,,,,,,,

रहीम जी भी कह गए , संचित धन होता दुखदायी
चैन सुख सब छीने रे , महिमा सच है बतलायी

अब बदलनी है प्रवृति , राम राज है लाने को
क्रान्ति जागृति की आ गयी , खुशहाली दिलाने को

ये माया (पैसा) होती रे मोहिनी , करे मति का नाश
मोह किया जिसने भी आज तक , हुआ उसी का विनाश
लिख दिया निचोड़ लेखनी ने , बेशक चलकर धीमी चाल
बस बात भविष्य में भी यही कहेंगे, रखना यही ख्याल
अब तो छोड़ ओ मुसाफिर ….

147 Views
#21 Trending Author
कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने... View full profile
You may also like: