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अब तुम आती भी हो तो बताती नही

Bhupendra Rawat

Bhupendra Rawat

गज़ल/गीतिका

August 19, 2017

अब तुम आती भी हो तो बताती नही
एहसास अपने आने का कराती नही

हवा के झरोख़ों सी आती हो
चुपके से छूकर जाती नही

फ़लक से दोस्ती कर ली है शायद
ज़मी पर तुम नज़र अब आती नही

ईद का चाँद बन बैठे हो अब
हिजाब से बाहर अब आती नही

किस्से अभी बाकी थे वफ़ा के
बेवफ़ाई हमें करनी आती नही

पर कुतर दिए सपनों के उन्होंने
हक़ीकत भी रास अब आती नही

आफ़ताब की नूर से कैसी दोस्ती
दोस्ती उन्हें अब रास आती नही

खोये रहते है उनके ख्यालों में
ख़्वाबों में अब वो आते नही

भूपेंद्र रावत
19।08।2017

Author
Bhupendra Rawat
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।
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