कविता · Reading time: 1 minute

अब जिह्वा क्यों मौन है?

छुब्ध संकुचित सी अधर में,
कल जो कल-कल खेलती!
उस चंचला की जाने कैसे,
अब खो गयी अठखेलियाँ!
नन्ही सी गुड़िया का पल में, बचपन मिटाता कौन है?
_____________________अब जिह्वा क्यों मौन है?

आज आंगन से न निकली,
बेजुबाँ परिंदो के मानिंद!
बन्द पिंजरे में है सिमटी,
हुई लुप्त सी ठिठोलियाँ!
उसके इस गुमशुदगी का, ज़ालिम गुनेहगार कौन है?
____________________अब जिह्वा क्यों मौन है?

लाडली हो गयी बड़ी है,
पर डर रहा परिवार क्यों?
घर मे अब सन्नाटे के जैसे,
क्यों व्याप्त है खामोशीयां!
निशब्द सी है किलकारियां, ऐसे गला दबाता कौन है?
_____________________अब जिह्वा क्यों मौन है?

शक्ति की प्रतिरूप है जो,
अबला का सा नाम क्यों?
बस्तु बना के सहेजते हम,
है किसकी ये कमजोरियां!
कौन रक्षक कौन भक्षक, नज़रो से निहारता कौन है?
____________________अब जिह्वा क्यों मौन है?

माँ का गर सम्मान है तो,
ये पावनी पतिता हुई क्यों?
न हो स्त्री आदर से बंचित,
मिटाओ भावों की दुश्वारियां!
ये तेरे घर की इज़्ज़तदारियाँ, तो ‘चिद्रूप’ दूसरा वो कौन है?
________________________अब जिह्वा क्यों मौन है?

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित २५/११/२०१८ )

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