***अबला नारी, बेचारी इसे सहन कर जाती है***

कौतूहल का विषय बना डाला है नारी को,
गर्व भरा मस्तक जिसका उस सुकुमारी को,
नीच भावना मानव की कुत्षित दृष्टि जमाती है,
अबला नारी, बेचारी इसे सहन कर जाती है।।1।।
ब्रह्मा के यह वाक्य नहीं हैं ‘सहन करेगी नारी ही’
महा मंडित कहलाता नर और मूढ कहाती नारी ही,
बात-बात पर यूँ झिड़कना नर की गन्दी सोच बताती है,
अबला नारी बेचारी इसे सहन कर जाती है।।2।।
नहीं पुरोधा नर समाज का, नारी भी उससे बढ़कर,
कदम-2 पर साथ निभाती, बढ़ जाती उससे ऊपर,
हीन भावना नर की, उसकी औकात बताती है,
अबला नारी, बेचारी इसे सहन कर जाती है।।3।।
ऐसा क्या अभिशाप यहाँ, औरत बाँझ कहाती क्यों?
नर मण्डली नहीं, अपने पौरुष पर उँगली उठाती क्यों?
सिद्ध हुआ इससे नर जाति अपने नियम बनाती है,
अबला नारी,बेचारी इसे सहन कर जाती है।।4।।

आगे की पंक्तियों में कविताकार ने अबला के स्थान पर प्रबला और बेचारी के स्थान पर वीरवती शब्द का प्रयोग किया है। क्यों कि वह बेशर्म की श्रेणी में नहीं रहना चाहता है।
इस पर सभी गौर फ़रमाऐगे।परिवर्तन कैसे किया है। कविता का आनन्द लें।

अबला की संज्ञा से क्या केवल नारी को समझाते हो,
ऐसी बेशर्मी की बातों से अपनी कायरता दिखलाते हो,
नर की ऐसी ही बातें नारी में द्वेष दिखातीं हैं,
प्रबला नारी, वीरवती इसे सहन कर जाती है।।5।।
ऐसी भाषा शैली बन्द करो, अत्याचारों को भी बन्द करो,
कान खोलकर सुन लो, पीछे बतियाना बन्द करो,
ऐसे पीछे बतियाना, नर की कायरता दिखलाती है,
प्रबला नारी, वीरवती इसे सहन कर जाती है।।6।।

##अभिषेक पाराशर##

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