Jul 31, 2016 · कविता
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अफ़सोस

अफ़सोस जताने ये मन निकला
क्यों ज्ञान में खोखलापन निकला
हम करते रहे श्रेष्ठ सिद्ध स्वयं को
मन से न अहम का घुन निकला
परिवार बिना माने अबला
ये कैसा नया उसूल निकला
जो साथ रहे बनकर सहयोगी
उन पर फिर ये रोष ही निकला
नहीं स्वीकार किया नवसुमन को
ये मधुवन क्यों पतझड़ निकला
अनुभव फीका क्यों पड़ जाता
जब अंकुर कोई नया निकला
अभी देर बहूत है समझाने में
वास्तव समझा क्या क्या निकला
आओ कारें फिर मन्थन चिंतन
बोया आम तो क्यों बबूल निकला
आग्रह है मानसिकता बदलो
तिमिर मिटा नव मार्ग निकला
हे श्री मदन कृपा कर दो
आ पाये हमे मिलजुल चलना
आहत बहुत मैं दृष्टिकोण से
क्यों स्त्री को इतना तुच्छ समझा
हे विवेक शील विद्जन जानो
यहीं सृष्टि का उदभव निकला

क्षमा सहित
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Dr.pratibha prkash
Dr.pratibha prkash
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डॉ प्रतिभा प्रकाश पुत्री/श्री वेदप्रकाश माहेश्वरी स्थायी पता मो.राधाकृष्ण ग्राम/पोस्ट अलीगंज जिला एटा उत्तर प्रदेश... View full profile
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