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अपने वजूद की पहचान कर चला है

NIRA Rani

NIRA Rani

कविता

November 17, 2016

आज दिल फिर से मुकम्मल हो चला है
तेरे यादो की गली से मुह मोड़ के चला है

उधार की खुशिया ..जो तुझसे होकर गुजरी
किसी जमाने मे जो थी सिर्फ तुझमे सिमटी

उल्फत के वो फसाने ..जिन्हे गुजरे हुए जमाने
नमी जिनको याद कर हो ..मुह मोड़ के चला है

दामन तेरी उल्फत का बस छोड़ कर चला है
बस !खुद के वजूद की पहचान कर चला है

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Author
NIRA Rani
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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