गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

अपने दिल में आग लगानी पड़ती है,

अपने दिल में आग लगानी पड़ती है।
ऐसे भी अब रात बितानी पड़ती है।।

उसकी बातें सुन कर ऐसे उठता हूँ।
जैसे अपनी लाश उठानी पड़ती है।।

वो ख्वाबों में हाथ छुड़ा कर जाये तो।
नींदों में आवाज़ लगानी पड़ती है।।

क्या खुशबु से में उसकी बच पाउँगा।
रस्ते में जो रात की रानी पड़ती है।।

अब जा कर के बात समझ में आई है।
लेकिन अब कमज़ोर जवानी पड़ती है।।

—–अशफ़ाक़ रशीद

23 Views
Like
24 Posts · 726 Views
You may also like:
Loading...