Jul 22, 2016 · कविता
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अपने.अपने आईने

अपने.अपने आईने

शहीदी सींच से
आज़ाद धरा पर
जो पली थी
जनतंत्र फ़सल
उसमें
स्वार्थी किरचें
ख़रपतवार सी उगीं
और
जनने लगी आईने
अब
अपने – अपने चेहरे
अपने – अपने आईने ।

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Ram Niwas Banyala
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राम निवास बांयलाrnप्रकाशित कृतियाँ- बोनसाई (कविता संग्रह ) हिमायत (लघु कथा संग्रह) rnसंपादित - पाप... View full profile
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