अपने अंदर बसे रावण को जलाते हैं

चलो इस बार कुछ ऐसा दशहरा मनाते हैं,
बस अपने अंदर बसे रावण को जलाते हैं।

अहंकार ही थी उसकी सबसे बड़ी बुराई,
चलो इस अहंकार को जलाकर आते हैं।

पुतले हर बार जला लिये हमने रावण के,
इस बार उसकी अच्छाइयों को अपनाते हैं।

उसके जैसी भक्ति करने का प्रण लेते हैं,
सच्चे मन से उस परमात्मा को ध्याते हैं।

अपनी बहन की रक्षा का वचन लेते हैं,
करके प्रयास कोख में मरने से बचाते हैं।

फैसले पर अडिग रहना सीखें रावण से,
खुद को रावण सा दृढ़ निश्चयी बनाते हैं।

अपनाएं हर एक अच्छाई उस रावण की,
आओ उस विद्वान के मिलकर गुण गाते हैं।

रावण के पुतले को नहीं बुराइयों को जलाएंगे,
सुलक्षणा आज हम मिलकर ये कसम ख़ाते हैं।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की...
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