"अपनी परंपरा और पीढ़ी को नजरंदाज कर रहे आज के युवा"

आज हम जिस समाज में रहते हैं उसे पढ़े लिखे सभ्य समाज की उपमा दी जाती है। हमारा हर काम सोच समझकर पूरे निरीक्षण परीक्षण के साथ सम्पन्न होता है। हम अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं। इन सब अच्छी बातों के बीच आज हम बहुत कुछ खोते जा रहे है, वह है संस्कार, अपनी परम्पराए रहन सहन का वह तरीका जिसमे एक परिवार में कई रिस्ते देखने को मिलते थे। आज का परिवार पति-पत्नी और बच्चों तक ही सीमित होकर रह गया है, परिवार में अच्छे बुरे की पहचान कराने वाली बूढ़ी दादी और दादा की कोई जगह नही बची है, बूढ़ी दादी जो स्वयं चलने को मजबूर होते हुए अपने पौत्र को गोदी में लेकर सौ बलाए लेती है आज उसी को युवा पीढ़ी नजरअंदाज कर रही है क्या यही हमारी प्रगति है? क्या यही हमारी नई सभ्यता है? इसी पर हम गर्व करते हैं एक बार हमें सोचना चाहिए यह कैसी प्रगति है हमारी, जो हमे अपनो से दूर करती जा रही है। हमारे पास सुख सुविधाओं के सभी अत्याधुनिक साधन होने के बाद भी नींद की गोलियां खानी पड़ रही है क्यों ? क्योंकि आज हमारे सिर पर स्नेह भरा वह मां का हाथ नहीं है और जिसके पूर्ण जिम्मेदार स्वयं हम हैं ।हमने अपने जीवन को व्यस्त नहीं वास्तव में अस्त व्यस्त बना लिया है हम अपनो को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहे है जो सुख तो दे सकता है लेकिन सुकून कभी नहीं दे सकता।

आज की नई युवा पीढ़ी एकल परिवार को ज्यादा पसंद करती है आखिर क्यों? ऐसा क्या दिया है एकल परिवार ने। जहां तक मेरा निजी मानना है आज की युवा पीढ़ी अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है उसे विलासिता का जीवन अच्छा लगता है अपनी निजी जिंदगी में किसी की दखलंदाजी उसे बर्दास्त नही, और यहीं सोच उसे आगे चलकर एक दिन एकाकी जीवन बिताने के लिए मजबूर कर देती है और फिर आरम्भ होता है बीमारियों का आना जाना जिसमे सबसे प्रमुख है तनाव जिसे हम टेंसन नाम से भी जानते हैं और यह जीवन पर्यंत चलने वाली बीमारी इंसान को तिल तिल कर मारती रहती है वह अपने मन की ब्यथा किसी के साथ साझा भी नही कर पाता क्योंकि साझा करने वाले सभी व्यक्ति उसने न जाने कब के अपने जीवन से दूर कर दिए होते हैं। व्यक्ति को तब समझ में आता है कि परिवार का हमारे जीवन मे क्या महत्व होता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। और वह उस स्थिति में पहुंच चुका होता है जहाँ से उसके बस का कुछ नहीं रहता। इसलिए समय रहते हमे सचेत होना चाहिए ईश्वर के स्वरूप अपने माता पिता का जितना संरक्षण मिल सके उसे प्राप्त करना चाहिए क्योंकि वह अगर एक बार हमसे दूर हो गए फिर तो दुनिया की ताकत हमे उनसे नहीं मिला सकती।

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