अपना साया

” अपना साया “
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हाँ !!
देखा है मैंने !
अपना साया !!
अपने साथ चलते
कभी आगे…….
तो कभी पीछे चलते !!
मेरा साया !
हरदम एहसास
कराता है |
मुझे दिखाता है…….
नूतन मार्ग !
नई मंजिलें !
और बताता है…….
संसार की नश्वरता !
ईश्वर से एकाकार !
कि – किस तरह
धीरे-धीरे …………
छाया की भाँति
बढ़ने वाला जीवन
घटने लगता है…….
और मिल जाता है !
पुन: परम तत्व से !
स्थूल काया का
सूक्ष्म साया !!
भला !
“दीप” से बेहतर !
कौन जानता है ?
कि- ऊपर जग को
रोशन करता दीप
और नीचे……….
उसका साया ||
——————————-
— डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”

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