अन्न की कीमत

कविता
???
अन्न की कीमत
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एक एक दाना बचा ले।
जो खाया खाना पचा ले।
क्यूँ बर्बादी करने को तुला है?
स्वार्थी बन इंसानियत को भुला है।
क्या हुआ कि तेरा पैसा है?
गरीब की भूख भी तो हम जैसा है ।
आखिर क्या मिलता ?जूठाकर फेंकना ।
जरूरत से ज्यादा हमें, रोटी क्यूँ सेंकना ?
मत भूल कि, ये किसानों की गाढ़ी कमाई है।
जिसने पसीने से सींचकर, ये सोना पाई है।
स्वाद के वशीभूत होके जिह्वा का कहा माना।
ठूंस-ठूंसकर खाके उदर को बनाया पाख़ाना।
कब तुझे मितव्ययिता का अर्थ समझ आयेगा ?
जानोगे जब आधी आबादी भूखा मारा जायेगा ?
तू पूजा करे धन को देवी मानकर ,
अन्न भी तो देवी स्वरूप है।
अब तो जाग, हे भोगी मानव!
खा उतना, जितना तेरा भूख है।
(✒✒रचयिता :- मनी भाई भौंरादादर, बसना महासमुंद )

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