अन्नदाता

धरती माँ की गोद में जन्मा
धरती पर ही जीवन यापन कर बड़ा हुआ
धरती पर ही लगन परिश्रम कर बढ़ने वाला
सर्दी गर्मी बरसात प्रत्येक मौसम में
काम करने वाला मैं पुत्र धरती का
नित प्रतिदिन परिश्रम करता
मेरी ही मेहनत से खेत खलिहान लहलहाते
स्वर्णिम भाँति फसल चहु ओर लहराती
सबका पोषण करने वाला
सब इच्छाओ को पूरी क रने वाला
रहता परे में अपनी इच्छाओं से
मेरे ही कारण खेतों में अनाज उगता
स्वर्णिम भाँति फसल लहलहाती
बड़े बड़े गोदाम भरे जाते
सबके घरों में अनाज पहुँचता
फिर भी मैं पीछे क्यों रह जाता
सर्दी गर्मी धूप बरसात सबकी मार सहता
कठिन परिश्रम कर अनाज उगाता
बड़े बड़े लोगों के एहसानो तले दबता
क्यों हर बार मैं ही पिछे रह जाता
सबका भरण पोषण करने वाला
मेरा अपना अस्तित्व कुछ नहीं
इतने पर भी
विपरीत परिस्थितियो का सामना करता
तथा अन्नदाता कहलाता

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