【25】 *!* मानव की अनैतिकता *!*

जिधर भी देखू नजरों को, मिलती धूमिलता
सोचा मानव दयावान, पर भरी कुटिलता
(1) पाप की गठरी बांध रहा है, इंसा जी भर
तिनके भर अब नहीं रहा, उसको ईश्वर डर
इसी जन्म में मिलेगा उसको, कर्मों का वर
काम नहीं आए उसकी, कोई चंचलता
जिधर भी…………
(2) धन दौलत के मद में, मानव बन गया बंदर
काट गरीब की जेब, वो खुद को कहे बवंडर
हाय – हाय करता खुद एक दिन, बन जाए खंडर
एक दिन रोये देख वह, अपनी व्याकुलता
जिधर भी…………
(3) कमा रहा अधर्म से, उड़ा रहा गुलछर्रे
धर्मराज के दर पर, कितने लगेंगे फर्रे
कांप जाएंगे तेरी रूह के, जर्रे – जर्रे
उस दिन मंसूबों को, आएगी घायलता
जिधर भी…………
(4) अभी नहीं सत्कर्म तो, फेर मिले ना मौंका
झूठे सुखों को क्यों मोती सा, जीवन झौंका
सच्चे कर्मों से ही भव से, पार हो नौंका
वक्त अभी है मिटा ले, जीवन की निर्बलता
जिधर भी………….

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