Oct 4, 2017 · कविता
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अनाथ

##अनाथ##

जन्म तो मैंने भी लिया था *माँ* के कोख से…
आसमान से ना आ टपकी थी….
फिर जाने क्यो रुठी माँ मुझसे… और किसी “अनाथालय” मे जा पटकी था…

आँख खुली तो,खुद को नंगी जमीन पर ठंड से ठिठुरते पायी….
जाने कहाँ गुम हो गई मेरी माँ,,, इस डर से खुब रोयी, और चिल्लायी…
कुछ अनहोनी तो नही हुई ना माँ के साथ, मन ही मन मै घबराई…

मेरे रुदन को सून कर,अनाथालय की बत्ती रोशन हो आई..
मेरे ही तरह जाने कितने बच्चे, कुछ दूध पीते, तो कुछ दौडते भागते, बच्चों का शोर दे रहा था साफ सुनाई…

तभी किसी अनजाने हाथो ने लिया मुझे गोद मे उठा..और बोली एक न्नही “अनाथ” अनाथालय मे आई….

कल तक हसती खिलखिलाती मै,किसी की गुडीया रानी थी..आज लिख दी गई अनाथ मेरी कहानी थी…

बहुत से सवाल मन को खाऐ जा रहे थे.. जब लोग मुझे अनाथ कह कर बुला रहे थे..

छोटी सी “मै” क्या नही लगती तुम्हारे बच्चों सी..
है वहीं आँखें, हाथ, पाँव भी मेरे जैसे तेरे बच्चों की…

काटोगे मुझे तो लहू भी मेरा निकलेगा.. हाड माँस का लोथड़ा हूँ मै… मिट्टी का कोई पुतला नही…

कहाँ है माँ???? इक बार तो आ जा….
बता सबको की मै तेरी बेटी… हूँ कोई अनाथ नही..

आ जा की अब ये “अनाथ”शब्द चुभते है मुझे..
खून खौल उठता है मेरा. .. जब लोग लापरवाह कहते है तूझे..

किया क्या कसुर जो, तू मुझको छोड गई..
बेटी थी मै तेरी,ऐसे कैसे मूहँ मोड गई..

गर इतनी ही बोझ थी मै तो कोख मे ही मार देना था..
यूं गलीयों मे नंगा फेंक कर “अनाथ” नही कर देना था…

गर बोझ थी मै तो तूझे मेरा एहसास नही करना था…
यूं समाज मे मुझे “अनाथ” नही करना था..।

✍✍✍अमृता मनोज मिश्रा

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