"अनमोल संस्कार" 100 शब्दों की कहानी

“थैक्यूमां” ज़िंदगी के हर सुख-दुख के पलों में तेरी ही दी हुई सीख व संस्कार को सार्थक रूप देते हुए ही जीवन में आगे बढ़ रही हूं । मुझे आज भी वो दिन याद है, तू अलमारी में कपड़ों के नीचे नकद राशि बचाती थी मां, अपरिहार्य स्थिति में पापा को वही काम आते । बेटी के जन्म के समय मेरी हिम्मत बनकर तुम ही साथ थी मेरे । तुम्हारे सानिध्य में रहकर ही मैं आत्मनिर्भर बन पाई । मां मेरी लेखनी को तुझसे ही मिला प्रेरणारूपी उपहार, इन्ही अनमोल संस्कारों को बच्चों के जीवन में करना है साकार ।

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