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“अनबुझी प्यास” (ग़ज़ल)

Dr.rajni Agrawal

Dr.rajni Agrawal

कविता

June 19, 2017

ग़ज़ल “अनबुझी प्यास”
बह्र 1222×4
काफ़िया-आ
रदीफ़- जाओ

छलकते जाम बन कर आप नयनों से पिला जाओ।
महकते ख़्वाब बन कर आप नींदों में समा जाओ।

धधक रिश्ते यहाँ नासूर बन कर देह से रिसते
दहकते ज़ख्म पर फिर नेह की मरहम लगा जाओ।

घटा घनघोर छाई है तरस अरमान कहते हैं
बरसते मेघ बन कर प्यास अधरों की बुझा जाओ।

भरी महफ़िल दिवाने जिस्म का सौदा किया करते
झनकते पाँव के घुँघरू बिखरने से बचा जाओ।

कहे रजनी सँभालूँ प्यार किश्तों में भला कब तक
खनकते दाम देकर आप किस्मत को सजा जाओ।

डॉ.रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी (मो.-9839664017)

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Author
Dr.rajni Agrawal
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न"... Read more

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