कविता · Reading time: 1 minute

अनकहे शब्द

*****अनकहे शब्द******
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लिख दो तुम बातें अनकही
जो मुंह से अब तक न कही

तेरे चेहरे को हम पढ़ पाएंगे
मनोभावों को खोल जाएंगे

तेरे अनकहे शब्दों की गठरी
भुरभुरे भावों जैसे हो पसरी

बेशक हो जाए अश्रु बरसात
ऐसी ही हो बेहतर शुरुआत

दरिया सी गहराई में समेट
गूढ़ी यादों को मंढें पर स्लेट

मनसीरत भला ये कैसे कहदे
अनकहे शब्द वो कैसे तज दे
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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