Jul 25, 2016 · कविता

अधूरी

अधूरी बातें
हमारी हर मर्तबा
बातें आधे में छुट जाती है ।
कभी तुम चुप हो जाते हो
कभी मैं पहले खामोश हो जाता हूँ
कैद होने लगते है खामोशी में
फिर तुम कहकहने लगती हो
और तोड़ देती हो इस सन्नाटे को
फिर गुप्तगु होने लगती है मौषम की
दादी के गुटने के दर्द की
दादा जी के हाजमे से लेकर
रिस्तेदारो की सियासत की
पर हमारी बात वही छुट जाती है
हर बार ये सोचता हूँ की मैं भरूँगा
इस रिक्त जगह को ख़ामोशी को मैं तोड़ूंगा
पर हर दफा तुम्हारी हंसी बाजि मार ले जाती है । नहीं समझ पाता हूँ तुम ये सन्नाटा तोड़ती हो या हमारे रिश्ते को टूटने से बचाती हो
तुम चाहती हो हमारी बात पूरी भी हो कभी या यूँ ही अधर में लटकी रहे ताकि चलता रहे ये सफ़र यूँ ही

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