.
Skip to content

अधजले दीये की लौ से.…

हरीश लोहुमी

हरीश लोहुमी

कविता

July 28, 2016

अधजले दीये की लौ से.…
*********************
अधजले दीये की लौ से,
जल उठा पवन,
और आया..एक झौंका बन ।
रच दिया चक्रव्यूह,
कहने लगा मौन बन,
…. हट जा पथ से !

पर नही,….
नहीं हटूंगा मैं इस पथ से,
मैं रक्षक हूँ इस लौ का,
इसे जलाया है मैंने किसी की याद में प्रेमाकुल होकर,
और जी रहा हूँ.. इसी के सहारे, इस तम-गर्त में ।

एकाएक ……..
न जाने कौन सा ख़याल उसका,
एक बूँद बन टपक पडा उस लौ पर,
मेरी ही आँख से,
और…….
दीया वीरान हो चला ।

****************************
** हरीश**चन्द्र**लोहुमी**
*****************************

Author
हरीश लोहुमी
कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने... Read more
Recommended Posts
मोहब्बतों का दिया ??
मोहब्बतों का दिया ?? मोहब्बतों के दिये जला कर ,रोशन कर रहा हूँ संसार नफरतों की आँधियों से मेरी लौ डग मगा रही है मैं... Read more
एक तिली हूँ
यह सच है मैं एक तिली हूँ, मुल्य मेरा कुछ नहीं , अस्तित्व मेरा है और ना भी, मगर फिर भी काफी हूँ मैं ,... Read more
बेटी का खत
आता नहीं है रोज जो ख़त जैसी बन गई मैं सब लिख दिया माँ पढ लो अब कैसी बन गई मैं। मुझको वो तेरा आंगन... Read more
मेरे साँवरे तुम
मैं टूटा हुआ हूँ, मैं बिखरा हुआ हूँ, मुझे अब संभालो, मेरे साँवरे तुम. भंवर मे मैं देखो, धसा जा रहा हूँ, यहाँ से निकालो,... Read more