Jun 27, 2016 · कविता
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अद्भुत संगम

अद्भुत संगम
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है दुखों का अगम पयोधि
हृदय गर्त अश्कों से भरा है ।
किस दुविधा में फँसा अकिंचन
दुनिया ये कितना गहरा है ।।

जब से देव रूप की आभा
मानस पटल पे आई है ।
तब से भाव से भीग हृदय
निज नैनों में आ उतरा है ।।

दुनिया में कितना गम है उसमे
मेरा गम कितना अदना है ।
हे ईश्वर मैं हर लो मेरी
मैं ने ही मुझको पकड़ा है ।।

हृदय द्रवित हो करुण हुआ
पग पग पर न्याय निहोरा है ।
न्याय का अब संचार करो
न्याय बिना सब बहरा है ।।

स्व में सर्व का अद्भुत संगम
क्या है ये अब मेल विहंगम ।
है हे गुरुवर सर्व समर्पण
न्याय बिना जग सहरा है ।।


सामरिक अरुण
NDS झारखण्ड
07/05/2016
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Arun Kumar
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