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अदब

Ramkumar Ramarya

Ramkumar Ramarya

गज़ल/गीतिका

March 15, 2017

किसी’ इस्कूल की बेजान सी’ मजलिस जैसे!!
अदब है शहरे ख़मोशां की परस्तिश जैसे!!

तमाम चेहरों से मुस्कान ऐसे ग़ायब है,
पढ़ा रहा हो छड़ीदार मुदर्रिस जैसे!!

न जाने कैसे काटते हैं रहबरी में गला,
कि कोई मेमना हो मुफ़्त का मुफ़लिस जैसे!!

@ कुमार ज़ाहिद,
10.2.17, 6.04

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Author
Ramkumar Ramarya
साहित्य मृगतृष्णा बन कर मन को दौड़ा रहा है। कई शेरों ने झपट्ट मारे, घायल किया, मरणासन्न हुआ, पर चौकड़ी नहीं छोड़ी। अतः प्रस्तुत हूँ! ?☺?

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